
न्यूकैसल अपॉन टाइन, ब्रिटेन
मार्च 2026
(कवयत्री परिचय: डॉक्टर, मैथिली और हिन्दी भाषा में रचना, समाज सेवा, भाषा एवं लिपि के विकास, और संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रयासरत।)
माता-पिता का हालचाल
तो बहुत लोग ले लेते हैं
लेकिन
वह संतान
जो दिन-रात उनकी देखभाल में लगी रहती है—
वही सच में उनके संघर्ष को
हल्का करती है।
कितनी भावनात्मक पीड़ा
चुपचाप सहती है,
रातों को जागकर,
हर पल चिंता में रहकर
अपने माता-पिता की सेवा में
अटल खड़ी रहती है।
सच्चे अर्थ में
संतान तभी ‘ईश्वर का वरदान’ होती है—
चाहे बेटा हो या बेटी—
वही संतान
जो माता-पिता की भावनाओं को समझ सके,
उनकी शारीरिक लाचारी,
उनकी थकान और जरूरतों को
मन से महसूस कर सके।
संतान वह नहीं,
जो समय आने पर
अदृश्य हो जाए,
और सिर्फ ज़मीन-जायदाद के
हिस्से में भाग लेने आए।
संतान वह है,
जो माता-पिता के काँपते हाथ
थाम सके,
उनकी आँखों की नमी
समझ सके,
और जीवन के अंतिम पड़ाव में
उन्हें सहारे का
एक सच्चा स्पर्श दे सके!!
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