जन्नत यहीं है (गीत)

प्रीति मिश्रा
प्रीति मिश्रा
गुरुग्राम, हरियाणा

मार्च 2026

अरे ओ रे ओ…
जी ले रे पगले…

जी ले ओ पगले, जी ले ओ पगले
ख़ुश हो सकता है, हो ले
जी ले ओ पगले

जी ले ओ पगले, जी ले ओ पगले
हँस ले, गा ले, रो ले
जी ले ओ पगले

ये जो तेरे पास है
वो कितना ख़ास है
ये बात कही है सयानों ने
क़िस्सों में, अफ़सानों ने

ये जो तेरे पास है
वो सबसे ख़ास है
जन्नत कहाँ ढूँढे
जन्नत यहीं है

जो आज है, वही सबसे बड़ा वरदान है
तू माँ की है दुआ
मन्नत तू ही है
तू सोच यहाँ पर क्यों आया है
या खुद से मिलने आया है
मान ले मेरी बात
जन्नत यहीं है

सागर की गहराई
पर्वत की ऊँचाई
झरनों की कलकल
मौसम की अंगड़ाई
जी ले ओ पगले रे…

फूलों का यूँ खिलना
सूरज का ढल जाना
दिन से रातों का
चुपके बदल जाना

रातों को तारों के संग
चंदा का इतराना
भँवरों का उड़ जाना
फूलों पर मंडराना

इन सब में ही जीवन की सच्ची पहचान है
ये जो आस-पास तेरे
फैली उजास है
पगले समझ ले
जन्नत यहीं है

जी ले ओ पगले, जी ले ओ पगले
ख़ुश हो सकता है, हो ले
जी ले ओ पगले

अरे जी ले ओ पगले, जी ले ओ पगले
जन्नत कहीं और नहीं…
जन्नत यहीं है
यहीं है… यहीं है
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