पिता! तुम मेरे सर्वस्व

सितंबर, 2022

प्रदीप देवीशरण भट्ट
हैदराबाद

तुम्हीं हो ज़िंदगी मेरी, तुम्हीं हो आस्माँ मेरे
तुम्हीं ही धाम चारों और, तुम्हीं हो कहकशाँ मेरे

गली में या मुहल्ले में, कोई जब चीखता मुझ पर
तुम आगे आते और बनते थे, हरदम हमज़बां मेरे

मुझे इससे या फ़िर उससे, नहीं कुछ लेना या देना
कि बचपन से जवानी तक, तुम्हीं हो रहनुमा मेरे

अभी निकला हूँ मैं बाहर, तुम्हारी छत्र छाया से
क़दम दो चलना है मुश्किल, सहारे बिन कहाँ मेरे

नहीं मैं जानता अच्छा बुरा, कहते किसे बोलो
तेरे कदमों से छोटे हैं, अभी भी कुछ निशाँ मेरे

भले छूटा हो गाँव तन से पर, मन है वहाँ अब भी
मेरी यादों में जिंदा अब तलक, हैं वो मकां मेरे

नहीं देखा है मैंने ईश को, वो दिखता है कैसा
नज़र में ‘दीप’ क़ी उसके पिता, हैं शहंशाह मेरे
****
(पिता दिवस पर विशेष)

यह भी पढ़ें  हंसते गाते चल हो यारा (गीत)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top