दिसंबर, 2022

कर्मचारी कालोनी,
गंगापुर सिटी (राज)
ये तन का किला भी
अब ढ़हने लगा है
उस किले की भाँति
जो दूर सुनसान में खड़ा है
अपना अतीत समेटे
यादों को लपेटे
गिरने लगा है
रह रह कर पलस्तर
निकलने लगे हैं
इसके भी पत्थर
कभी इस किले को
उस किले की भाँति
प्यार भरी नजरों से
निहारते थे लोग
आज आह भरकर
निकल जाते हैं पास से
ये बन चुका है संजोग
झरोखों से जिनके
आती थी मलयानिल
अब भग्नता से आती है
डरावनी आवाजें
इस किले उस किले में
साम्यता एक सी
लोग आते भी हैं पास तो
सिर्फ उड़ाने को मजाक
बीते दिन कभी लौटकर
नहीं आने वाले
ये जानकर
किले कभी रोते कभी मुस्कुराते
देखे जा सकते हैं
भूत से खुश
दु:खी अपने वर्तमान से
ये ढ़हते किले ये उपेक्षित किले…
