
हम 60+ हैं — सुन रहे हैं?
60+ हैं साहब—
ओल्ड नहीं, गोल्ड हैं!
बस चश्मा बड़ा हो गया है,
हौसले नहीं!
सुबह भगवान को याद करते हैं,
फिर घुटनों से पूछते हैं—
“आज साथ दोगे या छुट्टी है?”
चाबी कहाँ रखी—भूल जाते हैं,
मोबाइल कहाँ रखा—भूल जाते हैं,
लेकिन किसने क्या कहा था—
वो आज भी याद रहता है!
अब हर बात पर “जी हाँ” नहीं—
जो सही है, बोलेंगे;
जो गलत है, टोकेंगे!
और कोई ज़्यादा ज्ञान दे तो—
“बेटा, अनुभव Google पर नहीं मिलता!”
क्योंकि साहब—
60+ में उम्र सिर्फ़ गिनती है,
जिंदगी अभी बाकी है!
और याद रखिए—
हमारी उम्र मत गिनिए…
हमारे तेवर गिनिए!
क्योंकि 60+ हैं हम—
अब जिंदगी हमें नहीं,
हम जिंदगी को अपने हिसाब से चलाएँगे!
