दोहे

दिसंबर, 2022

समय गर्भ में क्या छिपा, कौन सका है जान।
ऊपर बैठा कोई है, रचता विधि- विधान।।

शारदा मित्तल
गुरुग्राम, हरियाणा

पनघट सूना हो गया उजड़ गई चौपाल।
बचपन भी इस दौर का, भूल गया ननिहाल।।

परम्पराओं से बंधे, अपने सब त्योहार।
एक विरासत ने हमें, सौंपा ये आधार।

क्रंदन करती कोख ने, पूछा खूब सवाल।
मैं भी तो इक जीव हूँ, किसने किया ख्याल।।

अंतरिक्ष को चूम रही, उड़ा रही है यान।
सारे बंधन तोड़कर ली क्षमता पहचान।

भाषा कहते नेह की, ये नैनों के द्वार।
जो पढ़ता है प्रेम से, जाने जीवन सार।।

इक गुड़िया मासूस सी, करती रही पुकार।
रक्षक भक्षक बन गये, करते अत्याचार।।
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