दिसंबर, 2022

हैदराबाद
कुछ अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बन जाते हैं,
काम कुछ करे नहीं ख्वाबों में सन जाते हैं।
अपने बारे में वे जोर शोर से ढोल पीटते,
और दिखावे की दुनिया में बन ठन जाते हैं।
करते रहते हैं हर वक्त अपनी वाहवाही,
अपनी तारीफ में रमा अपने मन जाते हैं।
पैर तो उनके रहते हैं सदा जमीन पर,
लेकिन हवा में उड़ने में उनके धन जाते हैं।
सुबह से शाम तक करते हैं यूँ ही बकवास,
इसी में बीत समय के करोड़ों टन जाते हैं।
नहीं आते हैं ऐसे लोग कभी किसी के काम,
बस खोखली बातों में सब इनके फ़न जाते हैं।
कहे ‘मनोरमा’ खुद की तारीफ है इक बीमारी,
लाइलाज ये जिसमें अनगिनत तन जाते हैं।
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