
गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)
कवि एवं चित्रकार
सितंबर, 2025
बचपन में शैतान रहा हूँ,
उतना ही नादान रहा हूँ।
हर कोई मुझे पढ़ना चाहे,
ऐसा मैं दीवान रहा हूँ।
दुनिया भर की जागीरों का,
जैसे मैं सुल्तान रहा हूँ।
जो भी चाहे आकर खेले,
शतरंजी मैदान रहा हूँ।
तेरे दिलकश अफसानों का,
मैं ही तो उन्वान रहा हूँ।
खुद अपनी क़ूवत को तोले,
मैं ऐसी मीज़ान रहा हूँ।
अपने ही दिल के भीतर,
बन कर के अनजान रहा हूँ।
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