दिसंबर, 2025

नालागढ़, हिमाचल प्रदेश
पार्क के बेंच पर हर रोज़ घंटों -घंटों तक।
दिन के 24 घंटे से लड़ाई करता है।
धीरे-धीरे लचकते कदमों से,
पार्क के कोने वाले बेंच पर बैठा।
वह घंटों- घंटों खुद की रुसवाई करता है।
पार्क के बेंच पर हर रोज घंटों- घंटों तक।
जीवन की भागम- भाग की सुनवाई करता है।
कितना भागा…. वह सबके लिए,
अब साथ… उनके चल भी नहीं पाता है।
फर्ज निभाया …..फर्ज को फिर क्यों याद नहीं आया।
वह घंटों- घंटों अब फर्ज की भरपाई करता है।
पार्क के बेंच पर हर रोज घंटों -घंटों तक।
दिन के 24 घंटे से लड़ाई करता है।
वक्त बहुत तेजी से निकल गया।
हाथ से हाथ का सहारा भी फिसल गया।
जिंदगी में बहुत पाया और बहुत छूट गया।
यह एहसास पहले कभी इतना नहीं सताया।
अब लगता है जैसे कुछ समझ ही नहीं पाया।
जीवन का सार अंतिम सांसों के करीब समझ आया।
उमरभर परिवार जोड़ते-जोड़ते,
आज वृद्धावस्था में खुद को अकेला पाया।
चलो उठो…..आज पार्क के सब बेंच जोड़ लेते हैं।
वृद्धावस्था के इस बरगद में हम जीवन मूल्यों को शरण देते हैं।
जिन्हें कदर नहीं ..कोई बात नहीं। हम सहारों का चयन करते हैं।
*****
