दिसंबर, 2025

मेरठ, उत्तर प्रदेश
(कवि परिचय: तीन काव्य संग्रह “दरिया सूखकर सहरा हुआ है”, “असलियत में चांद मेरे पास है” और “उर नाद”, एक कहानी संग्रह “काला हंस”, अनेक साझा संकलन, दर्जनों पत्र पत्रिकाओं में नियमित स्तम्भ एवं रचनों का प्रकाशन, ऑल इंडिया रेडियो से नियमित प्रसारण)
दिसंबर को विदा कर दो, बरस नव आ रहा है
नए माहौल में आकर, नया कुछ पा रहा है
जिधर भी देखिए, कोहरे ने, चादर ओढ़ रखी है
वहीं सूरज सुबह का गीत, फिर से गा रहा है
मकर संक्रान्ति की बाट कब से, जोह रहे हैं
गेंहू सँग फूल सरसों, बन सँवर के आ रहा है
कभी बरखा कभी आतप, डराते हैं सभी को
ये जाड़ा जाते-जाते, लौट फिर से भा रहा है
बसंती रँग में रंगकर, हम भी खुश हैं वो भी खुश है
धरा की अर्चना कर, गीत फिर से गा रहा है
चलो फागुन की मस्ती में, जलाएँ होलिका सारे
बसौडा आठवें दिन घर सभी के आ रहा है
नया सृजन नया अर्चन, करोगे ‘दीप’ कब बोलो
शिशिर अब जा रहा, निदाघ घर पे छा रहा है।
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