यूं ही जीवन…

दिसंबर, 2025

vyagra pandey
विश्ववम्भर व्यग्र
कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी, राज.

(कवि परिचय: देश-विदेश के प्रमुख समाचार-पत्र व पत्रिकाओं में रचनाओं का अनवरत प्रकाशन। ‘कौन कहता है’ (2017), ‘पाण्डे जी कहिन’ (2018), ‘मौन क्यूँ हो’ (2020), ‘अठखेलियां शब्दों की’ (2024) इत्यादि प्रकाशित पुस्तकें।)

समुद्र तट ना पहुंच सका तो
पोखर के किनारे जाकर
मन की संतुष्टि कर लेता
खुद को इस दृष्टि में लाकर।

उड़ ना पाता आसमान में
हाथ उठाकर दोनों अपने
पंख समझ फैला देता हूं
कर लेता हूं पूरे सपने।
संबंधों की महा भीड़ में
खुद को जब अकेला पाता
स्वयं पास बैठकर स्वयं के
मधुर मधुर संगीत सुनाता।

छोटे छोटे खुशियों के क्षण
निकल जाते बिना मिले जब
अगले दिन की आश भरोसे
करूं प्रतिक्षा सुमरूं मैं रब।
मन की फसल सूखती जब
अश्रु जल से सिंचित करता
कागज की भूमि पर फिर
शब्द बीज अंकुरित करता।
उपलब्धि जुटा ना पाया
यूं ही जीवन रीत चला है
कहते हो संसार सुहाना
भगवन तेरी कैसी कला है।
*****

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