ग़ज़ल

दिसंबर, 2025

naveen mathur pancholi
नवीन माथुर पंचोली
अमझेरा धार मप्र

कहाँ अब आसमानों की कमी है।
परों में ही उड़ानों की कमी है।

सड़क को देखकर सोचा किये सब,
नगर में आशियानों की कमी है।

छुपा लेती हैं आहें बात अपनी,
सदाओं में ज़बानों की कमी है।

कोई लायक़ कहाँ से आये चुनकर,
जहाँ सच इम्तिहानों की कमी है।

ख़रीदारी में हुई जेब खाली,
यहाँ सस्ती दुकानों की कमी है।

मज़ा आया नहीं पढ़कर क़िताबें,
वो जिनमें दास्तानों की कमी है।
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