दिसंबर, 2025

कैसे भूलूं अपने गांव को
उस पीपल के छांव को।।
बैठ जहां पर करते थे
कितनी सारी बातें
चिड़ियों के चुनचुन संग
जुड़ी कितनी जज्बातें।।
जहां कोना कोना अपना था
संजोया हर सपना था।।
बाल मंडली का वह समूह
मनगढ़ंत कहानी, भूत प्रेत और रूह।।
जहां हर त्यौहार एक उत्साह था
प्रोत्साहन का वाह वाह था।।
कितना प्यारा कितना न्यारा
था वो बचपन
जिसे याद कर
मुस्कुराता है पचपन।।
हरे भरे खेत खलिहान
ठहाको से गूंजता दलान।।
मदमस्त हवा से बातें करता लड़कपन
कितना निश्चित और खुश था बचपन।।
पूरा गांव अपना घर था
किसी से ना डर था।।
शाम होते हीं वो ताऊजी की आवाज
पढ़ने नहीं आओगे आज?
लालटेन लेकर धरफराना
अपना अपना चादर बिछाना।।
कुर्सी पर बैठे ताऊ जी का पहरा
ना हो भाई बहन में झगड़ा।।
बरामदा के दोनों ओर फुलवारी
सबको सबसे यारी यारी।।
बागों में कोयल संग गाना
सर में झूम झूम नहाना।।
कहां गए वो अपने
सजाना सिखाएं जिन्होंने सपने
संघर्ष के समय सभी थे!!
सुख के समय चले गए दुनिया से
मिल भी नहीं पाए अपनी मनिया से।
काश!! एकबार फिर मिल जाते
दौड़कर उनके हृदय से लग जाते
कहते उनको
कितनी भी उड़ूँ आकाश में
सुकून तो है जड़ के पास में।।
उनको कृतज्ञता जताती
त्याग तपस्या गिनवाती।।
जो व्यतित किये पूरा जीवन
हमारे भविष्य बनाने मे
पेड़ पौधे लगाने मे।।
जगह-जगह बनाए जलाशय
समझ ना सकी थी तब आशय।।
मंजिल पाकर पहुंचे जब अपने गांव
बढ़ा नहीं पा रहे हैं अपने पांव।।
धूल जमीं कुर्सी पर रो रहा था दलान।।
भीड़ में रहकर कभी नहीं सोचा था
कि!! सूना और विरान मिलेगा
सन्नाटे के चादर ओढ़े
अपना ये दलान मिलेगा!!
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