जून, 2026

दिल्ली
मेरे बिना कहाँ है संभव, किसी समाज का निर्माण,
ये बात और है कि पहले नहीं था किसी का ध्यान…
सृष्टि की जननी हूँ मैं हमेशा से, जनना जिम्मेदारी,
अभिवावक के नाम में पहले, नहीं थी हिस्सेदारी…
मेरा बनाया हुआ हमेशा से सब, पेट भर खाते थे,
मैं घर संभालती थी, तभी तो काम पर जाते थे…
मेरी जरुरत थी हर एक घर के, बंद सी दीवारों को,
चुन दिया जाता था बेरहमी से, मेरे अधिकारों को…
कमोवेश स्थिति एक सी थी, महिला थी अलग वर्ण,
स्त्री को वस्तु समझा सबने, हरिजन हो या सवर्ण…
बड़ी मुश्किल से बेड़ी तोड़कर, पहुँच पाई हूँ स्कूल,
राहों में काँटों की भेंट चढ़ी हैँ, अनगिनत कली फूल…
घर की जिम्मेदारियों संग, हर क्षेत्र में कदम बढ़ाया है,
अपमान की सैंकड़ो गालियाँ खाकर, सम्मान पाया है…
हुई नहीं हूँ पूर्ण सुरक्षित अब भी, मुश्किल है निकलना,
डर के सही पर सीख लिया है, कठिन राह पर चलना…
रफ़्तार धीमा सही, गमों के बादल अब छंटने लगे हैँ,
कहीं कहीं ही सही, स्नेह बराबर बराबर से बँटने लगे हैँ…
आत्मनिर्भरता का स्वाद चखा है, जीना नहीं एहसान पर,
नाता अब भी है घर की रसोई से, संग चढ़ें आसमान पर…
योगदान हमारा हमेशा से था, अब लोगों को दिखने लगा है,
नजरें पहुँची है हम तक, अखबार भी हमको लिखने लगा है।
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