अमृता प्रीतम और उनकी मार्मिक पुकार ‘वारिसशाह नूँ’

सितंबर 2026

sitaram gupta
सीताराम गुप्ता
पीतमपुरा, दिल्ली

अमृता प्रीतम पंजाबी भाषा की एक प्रसिद्ध कवयित्री हैं। उन्हें पंजाबी भाषा की पहली अग्रणी कवयित्री, उपन्यासकार और लेखिका मानें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त सन् 1919 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गुजराँवाला नामक स्थान पर हुआ था। विभाजन के बाद अमृता लाहौर से भारत आ गई थीं लेकिन उन्हें दोनों देशों में अपनी रचनाओं के लिए ख्याति मिली। क्योंकि युवा अमृता प्रीतम ने विभाजन की त्रासदी को अपनी आँखों से देखा और दिल में उसकी कसक महसूस की इसलिए उनकी रचनाओं में ये दर्द पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है।

अमृता प्रीतम पंजाबी में साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956) पाने वाली पहली महिला रचनाकार थीं। अमृता को पद्मश्री और पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 1982 में उन्हें ‘कागज ते कैनवास’ के लिए साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। प्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वालों में भी अमृता प्रीतम पंजाबी भाषा की पहली साहित्यकार एवं कवयित्री थीं। बेशक अमृता प्रीतम को ये प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला क्योंकि वे इसकी हक़दार थीं लेकिन पंजाबी में रूढ़िवादी सोच से ग्रस्त साहित्यकारों के गुटों ने इसके लिए उनका विरोध भी ख़ूब किया। इस विरोध का क्या कारण हो सकता है? वास्तव में अमृता प्रारंभ से ही स्वतंत्र विचारों की रही हैं। एक दकियानूसी समाज, चाहे वह स्वयं को कितना ही प्रगतिशील सिद्ध करे, इसे कैसे स्वीकार कर सकता है? उनसे प्रभावित होते हुए भी लोग उनके विरोध में रहे हैं जिससे उनकी स्वयं की प्रगतिशीलता पर ही प्रश्नचिह्न लगता है।

ये सच है कि अमृता प्रीतम को किसी प्रकार का बंधन स्वीकार्य नहीं रहा। यदि हम परिवार के क़ायदे-क़ानूनों की बात करें तो वे अनावश्यक रीति-रिवाजों और धार्मिक पाबंदियों का प्रारंभ से ही विरोध करती थीं। उनके लेखन में ही नहीं उनके बाद के जीवन में भी ये सब झलकता है। आज हम जिस प्रकार के वर्जनारहित समाज में रह रहे हैं अमृता प्रीतम ने सात-आठ दशक पहले उसी प्रकार का जीवन जीने का साहस दिखलाया। वास्तव में अमृता जीवन के हर क्षेत्र में बहुत आगे रही हैं। आश्चर्य की बात ये है कि समय बदलने के साथ आज भी उनके साथ भेदभाव जारी है। कुछ दिन पहले मैं नेट पर गुरुमुखी में उनकी रचनाएँ खोज रहा था लेकिन अधिकांश साइट्स पर उनका नाम ही नहीं मिला जबकि हिंदी में वे हर जगह उपस्थित हैं। वास्तव में हिंदी वालों ने अमृता को जितना पढ़ा और सराहा अन्यत्र दुर्लभ है।

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अमृता वर्ष 1986 से 1992 के बीच राज्यसभा की सदस्य भी रहीं। वर्ष 2003 में उन्हें पाकिस्तान की पंजाबी अकादमी ने भी पुरस्कार दिया, जिस पर उन्होंने टिप्पणी की, ‘‘बड़े दिनों बाद मेरे मायके को मेरी याद आई।’’ अमृता ने कई वर्षों तक पंजाबी की साहित्य पत्रिका ‘नागमणि’ का संपादन किया। उन्होंने कई आध्यात्मिक किताबों की भी रचना की। इसी दौरान उन्होंने ओशो की कई किताबों के लिए काम किया। उनकी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ उनकी कालजयी रचनाओं में से एक है। 31 अक्तूबर सन् 2005 को उनके निधन से न केवल पंजाबी साहित्य को आघात पहुँचा अपितु संपूर्ण भारतीय साहित्य के लिए यह गहरा घक्का था।

कविता और गीतों के अतिरिक्त उन्होंने कहानी, उपन्यास तथा गद्य की अन्य विधाओं में भी भरपूर लिखा है। अमृता प्रीतम की लोकप्रियता का कारण रहा है उनकी रचनाओं का बनावटी न होना। अमृता जी जो भी लिखतीं थीं उनमें तथ्यों की वास्तविकता तथा भाषा की सरलता झलकती थी। अमृता प्रीतम ने पंजाबी साहित्य में महिलाओं की सबसे लोकप्रिय आवाज के तौर अपनी पहचान बनाई। यद्यपि आध्यात्मिकता व दार्शनिकता अमृता प्रीतम के जीवन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व रहा है लेकिन फिर भी उन्होंने अपने को कभी आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया और न ही अपनी भाषा को कलिष्ट होने दिया।

पंजाबी लेखन में स्पष्टवादिता और अपने साहस के बल पर अमृता प्रीतम ने समकालीनों के बीच बिलकुल अलग जगह बनाई। अमृता ने ऐसे समय में लेखनी में स्पष्टवादिता दिखाई, जब महिलाओं के लिए समाज के हर क्षेत्र में खुलापन एक तरह से वर्जित था। अमृता का साहस और बेबाकी ही थी जिसने उन्हें अन्य महिला लेखिकाओं से अलग पहचान दिलाई। और यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। अमृता प्रीतम ने ‘रसीदी टिकट’ नामक अपनी जो आत्मकथा लिखी थी वह भी बहुत चर्चित रही है क्योंकि इस आत्मकथा में उन्होंने अपने जीवन की सच्चाइयों को जिस ईमानदारी से प्रस्तुत किया है वह अन्यत्र दुर्लभ है।

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अमृता प्रीतम को सबसे ज्यादा उनकी कविता ‘‘अज अक्खां वारिस शाह नू’’ के लिए जाना जाता है, जिसमें उन्होंने विभाजन के दर्द को मार्मिक तौर पर पेश किया। अमृता की हर रचना विभाजन के दर्द को अलग तरह से दिखाती है, भले ही वह उपन्यास ‘पिंजर’ हो या कविता ‘‘अज आखां वारिस शाह नू’’ हो। कविता ‘वारिसशाह नूँ’ पंजाबी भाषा के प्रसिद्ध व लोकप्रिय कवि वारिसशाह को संबोधित करके लिखी गई एक अत्यंत प्रसिद्ध तथा मार्मिक कविता है जिसमें कवयित्री वारिस शाह को तत्कालीन त्रासदी से अवगत कराते हुए एक बार फिर पंजाब की बेटियों का दुख बाँटने के लिए एक नया प्रेमगीत अथवा प्रेम का एक नया अध्याय रचने का आह्वान कर रही हैं।

कविता ‘‘अज आखां वारिस शाह नूं’’ के अतिरिक्त अमृता प्रीतम यदि और कुछ भी नहीं लिखतीं तो भी ये एकमात्र कविता ही उनकी प्रसिद्धि के लिए पर्याप्त होती। स्वतंत्रता के बाद भारत-पाक विभाजन की त्रासदी पर आधारित अमृता प्रीतम का एक उपन्यास है ‘पिंजर’। इसी उपन्यास पर आधारित ‘पिंजर’ नाम की एक फिल्म भी बनी है जिसमें ‘वारिसशाह नूँ’ कविता का भी उपयोग किया गया है। विभाजन की त्रासदी पर बनी फ़िल्मों में पिंजर एक अत्यंत सशक्त फ़िल्म है लेकिन महत्त्वपूर्ण होते हुए भी ये फ़िल्म अपेक्षित लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सकी। इससे स्पष्ट होता हे कि हमारी संवेदनशीलता का निरंतर ह्रास होता जा रहा है। प्रस्तुत है कविता ‘‘अज आखां वारिस शाह नूं’’ का देवनागरी में लिप्यंतरण व हिंदी अनुवाद:

अज आखां वारिस शाह नूं (पंजाबी में)

अज आखां वारसशाह नूँ कितों कबरां विच्चों बोल
ते अज किताबे-इश्क दा कोई अगला वरका फोल

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इक रोई सी धी पंजाब दी तूं लिख-लिख मारे वैण
अज लक्खां धीआं रोंदीआं तैनू वारसशाह नूँ कहण

उठ दरदमंदां दिआ दरदिआ! उठ तक्क आपणा पंजाब
अज्ज बेले लाशां विच्छिआं ते लहू दी भरी चनाब

किसे ने पँजां पाणीआं विच्च दित्ती ज़हिर रला
ते उन्हा पाणिआं धरत नूँ दित्ताद पाणी ला

जित्थे वजदी सी फूक पिआर दी वे ओह वंझली गई गुआच
रांझे दे सब वीर अज्ज भुल्ल गए उसदी जाच

धरती ते लहू वस्सिआ कबरां पईआं चोण
प्रीत दीआं शाहज़ादीआं अज्ज विच्च मज़ारां रोण

अज सब्भ कैदो बण गए हुस्न इश्क दे चोर
अज कित्थों लिआईए लब्भ के वारसशाह इक होर

अज आखां वारसशाह नूँ तूँहों कबरां विच्चों बोल
ते अज किताबे-इश्क दा कोई अगला वरका फोल

-अमृता प्रीतम

अज आखां वारिस शाह नूं (हिंदी अनुवाद)

आज वारिसशाह से कहती हूँ कि अपनी क़ब्र में से बोलो,
और प्रेम की पुस्तक का कोई नया पृष्ठ खोलो।

जब पंजाब की एक बेटी रोई थी तो तूने उसकी लंबी दास्तान लिखी थी,
आज लाखों बेटियाँ रो रही हैं वारिसशाह! और तुझसे कह रही हैं।

ऐ दर्दमंदों के दोस्त! उठो और अपने पंजाब की हालत देखो,
चौपालें लाशों से अँटी पड़ी हैं और चनाब लहू से भरी हुई है।

किसी ने पंजाब के पाँचों दरियाओं में ज़हर मिला दिया है,
और यही पानी धरती को सींचने लगा है।

जहाँ प्यार के नग़्मे गूँजते थे वो बाँसुरी न जाने कहाँ खो गई,
रांझे के सब भाई वैसी बाँसुरी बजाना भूल गए।

आज वारिसशाह से कहती हूँ कि अपनी क़ब्र में से बोलो,
और प्रेम की पुस्तक का कोई नया पृष्ठ खोलो।

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