
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
मार्च 2026
कभी रही थी शान अनूठी
अब हैं निपट अकेले,
फ्यूज बल्ब से वृद्ध हुए हैं
रत्ती माशा धेले।
ढइया या छटांक से घर में
देते नहीं दिखाई,
बदला वक्त जमाना, पीढ़ी
नयी सामने आई।
साथ समय के बदल न पाए
अब रहते एकाकी,
शाम सुबह फिर शाम गिन रहे
दिन कितने हैं बाकी,
चलो समय के साथ, बता दो
जीवन की परिभाषा,
मानक बनो स्वयं, दिखला दो
क्या होती है आशा।
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