मार्च, 2025

रजत कॉलोनी,
बूंदी (राज)
जाल में मछली फंसी आँखें सजल हुई
मछुआरे तेरी पहल पे मेरी ग़ज़ल हुई
छूटती हुई सांसों का दौर जब यहां चला
होठो पे तैर करके ये आहें चपल हुई
अंतर यूं आया चाल में थोड़ा उजास है
कुछ तो अंधेरा कम हुआ, चाहें धवल हुई
साया तो आगे-पीछे या ओझल भी हो गया
दिल में छुपी ये बाते पर काहे तरल हुई
उकता के घर से शहर में आना भी लाजमी
लौटे तो घर की यूं लगी राहें सरल हुई
आँखें मिचौली जिंदगी करती रही यूँ ही
धूप – छाया कभी अमरित – गरल हुई
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