दिसंबर, 2024

न्यू अशोक नगर, दिल्ली
खींझती झल्लाती अपनों पर झूंझलाती हुई निकली मैं सेंकने धूप
हरित वाटिका हरित आसनांदिका
हरित अशोक स्वरणित आलोक
बीच बैठी मैं चुप।
एक पर्ण गिरा सिर पर टक
मैं देखी ऊचक।।
तरुवर उड़ाया मेरा मजाक
मैं हुई आवाक।।
क्रोधित हो उसे देखी अहं से
मैं कौन हूं सोच लो जरा ढंग से।।
दिन-रात करती हूं काम
कभी ना करती आराम
जग में है मेरा नाम
क्या समझोगे रे आज्ञान।।
तभी हाथ में आया सूप
मै बैठी चुप।।
हा! हा! मै अज्ञान!!
दिख गया तेरा ज्ञान
तुम जो श्रम करती हो
उसका फल रस पीती हो
ऐसो आराम में रहकर
अपना जीवन जीती हो।।
मुझे क्या मिलता है जग से
तुम सम ठग से
शीत धूप ताप सहकर
खड़ा रहता हूं अड़कर।।
केवल मिलता है हमको धूप
मैं बैठी चुप।।
जीने के लिए देता हूं सांस
आश्रय के लिए बस बांस।।
वसन के लिए कपास।।।
अंत चिता की अनल अचूक।।
मैं बैठी चुप।।
स्वर से झंन्नाया माथ
कंपित हुआ हाथ
एहसास हुआ साथ।।।
सुन तरुवर शब्द अचंभित
मैं मौन लज्जित।।
यह जीवन है तरुवर पर आधार
सच में करुंगी सुधार।।
बदल गया मनका स्वरूप
मैं बैठी चुप।।
गई सिकुड़ कर बैठ
निकाल के अपनी ऐंठ।।
पंजों की सहलाहट
हुई बिल्ली की आहट।।
नाच रही थी जोड़े में
खुश थी कितने थोड़े में।।
देख प्रसन्नता उसकी
हो गई मैं मूक।।
मैं बैठी चुप।
अचंभित हो पूछा उसे
ठंड नहीं लगती तुझे।।
बोली ठंड लगती है मुझे
पर कहूं किससे
तुम लोग अपने में मस्त रहती हो
छोटी दुख से त्रस्त रहती हो
हम तो हैं लाचार
ना कर सकते स्वयं उपचार।।
पर तुम हो सर्वशक्तिमान
कर सकते हो हर काम।।
फिर भी ना बदलते हो व्यवहार
बन बैठे हो बुत
मैं बैठी चुप।।
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