सितंबर, 2025

(स्वरांजलि सेवा संस्थान)
वाल्मीकि नगर, पश्चिम चंपारण, बिहार
उत्तर से दक्षिण तक धारा।
हिंदी से फैला उजियारा।।
घर आंगन की प्यारी बोली।
लगे सुहानी जैसे होली।।
तरह-तरह के रंग समाए।
हर कोई इसको अपनाए।।
सुंदरता की यही परिभाषा।
मेरी हिंदी मेरी भाषा।।
भारत भाषाओं का संगम।
फिर भी हिंदी सबसे अनुपम।।
गांव देहात की बोली प्यारी।
उसकी गरिमा भी है न्यारी।।
विश्व पटल पर शोभा लाए।
माथे की बिंदी सी छाए।।
सुंदर-सुंदरतम सुंदरतर।
गूंजे इसकी ध्वनि धरा पर।।
हिंदी भारत की पहचान।
कहता मेरा संविधान।।
सुंदर फूलों वाली क्यारी।
हिंदी है पहचान हमारी।।
अपनापन ममता औ प्यार।
ऐतिहासिक हिंदी संसार।।
अंग्रेजी से बिल्कुल दूर।
तभी तो हिंदी है मशहूर।।
हिंद देश की हिंदी भाषा।
जैसे सुंदर खेल तमाशा।।
चंपा चमेली रजनीगंधा।
जैसे गगन में सूरज चंदा।।
सरल सहज और है आसान।
सब करते इसका सम्मान।।
हिंदी करती जग का वंदन।
इसकी महक मलयागिरि चंदन।।
हिंदी भाषाओं की सरिता।
डी. आनंद सुनाये कविता।।
****
