
दिसंबर, 2025
तन्हाइयों में हमेशा ही रहने लगे अब हम
नई पीढ़ी के साथ रहकर अकेले हुए हम
ये उम्र की दरकार है कहने लगे अब हम
मोह त्याग अन्तर्मन में बहने लगे अब हम
दो चार लोग घर में कभी अपने थे जो तब
कुछ पराए से जाने क्यों लगने लगे वो अब
अजनबी कुछ साथ राहगीर बन मिल चले
हमसफ़र बनकर अपना कहने लगे वो सब
अध्यात्मिक दृष्टिकोण से चिन्तन मनन किया
छूटे बन्धन तो दृष्टा बन के हमने देखा सभी
देह का शक्ति सामर्थ्य अकस्मात घटने लगा
आत्मशक्ति भुलाकर जीवन गंवाया सा लगा
अकेलेपन को मन ने संन्यास-अवस्था जाना
राम-धुन मन में जगी, मस्त रहने लगे हम
जो शेष रह गया जीवन हो दुनियादारी से परे
अब कोशिशें इतनी हैं कि आत्मशांति से रहें
सहज सरल सी राह चलें, गांठें सभी खोलें
निर्मल हृदय रहे, सबसे स्नेह से मिलें-जुलें
हर देह में है एक ही परमात्मा स्वरूप
है सत्य सनातन यही स्वीकार सब करें।
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