ओढ़ ली खामोशी मैंने

सितंबर 2026

rajendra lahiri
राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)

ओढ़ ली खामोशी मैंने,
किसी हथियार के रूप में नहीं;
बस अपने बचाव के लिए,
महसूस हो रहे दुराव के लिए।

करता रहा अब तक निर्देशित सबको,
नास्तिक मन द्वारा मान चुके—
अपने परिवार रूपी रब को,
पर अब निर्देशन किसी को सुहाता नहीं है।

मेरी मौजूदगी भी किसी को सुहाती नहीं है,
चकित हूँ अचानक आए इस मेहमान के लिए;
जिसने एकांत का यह कमरा सजा दिया,
और मेरी ही महफ़िल में मुझे पराया बना दिया।

वक़्त बदला तो रिश्तों के मायने बदल गए,
जो कभी साए थे, वे धूप बनके ढल गए।
मेरी हर सलाह अब इक दीवार-सी लगती है,
अपनों के बीच भी यह ज़िंदगी बीमार-सी लगती है।

शब्द थक चुके हैं अब मिन्नतें करते-करते,
थक गया हूँ मैं भी अंदर ही अंदर मरते-मरते।
इसलिए अब मैंने चुप रहने का हुनर सीख लिया,
शिकायतों के पन्नों को भीतर ही भींच लिया।

कोई पूछे तो कह देना कि अब मैं बोलता नहीं,
यादों के बंद संदूकों को अब मैं खोलता नहीं।
यह खामोशी ही अब मेरा एकमात्र ठिकाना है,
किस्मत का लिखा समझकर इसे अब निभाना है।

हाँ, ओढ़ ली खामोशी मैंने…।

यह भी पढ़ें  आजादी

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top