‘नाविक’ के दोहे

जून, 2026

डॉ. विजय नागपाल ‘नाविक’, वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार, ट्यूलिप वॉयलेट, गुरुग्राम

पूरक आपस में सदा, धर्म और विज्ञान।
नहीं विरोधी मानिए, तज ज़हरीली तान॥

मनसा- वाचा- कर्मणा, सदाचार व्यवहार।
‘उसकी’ रहे निगाह में, प्राणी करो सुधार॥

सर्व धर्म सम्भाव का, कथन हुआ मशहूर।
यक तरफा सिद्धांत पर, हमें नहीं मंज़ूर॥

शत्रु सनातन के रहे, मूरत भंजक लोग।
अब भी करने दे रहे, हम अपना उपभोग॥

किया धर्म पर वार ग़र, होगा तेरा नाश।
धर्म हीन प्राणी रहे, जीते जी ज्यों लाश॥

ताक़त संचय कीजिए, हो तन-मन बलवान।
ठसका इतना हो सदा, शत्रु रहे हलकान॥

कुल विशेष में जन्म ले, बनते आप न श्रेष्ठ।
कर्म बनाते आपको, दुनिया में परमेष्ठ॥

जुड़ना अगर ज़मीन से, सबको अपना मान।
सबकी पीड़ा बाँट ले, बिना जान-पहचान॥

सबकी अपनी भूमिका, अपना-अपना स्थान।
एक साथ मिल वर्ग सब, बनते हिन्दुस्तान॥
(परमेष्ठ – सबसे ऊँचा स्थान)
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