वो होली तब की… और आज की होली

मार्च 2026

अमित
अमित
विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया

वो बचपन की होली, गली की पहचान,
हर आँगन में गूँजता रंगों का गान।
एक नेता खुद ही बन जाता था,


चंदा जुटाने में आगे आता था।

घर-घर जाकर सबको मनाता,
कोई पैसे देता, कोई लकड़ी लाता।
पुरानी खाट, टूटी कुर्सी-दरवाज़ा,
सबका ढेर लगता बीच मोहल्ला।

शाम ढले जब होलिका जलती,
लपटों में आस्था खिलती।
गले मिलते, भूलते शिकायत,
नए सिरे से होती शुरुआत।

दूसरे दिन रंगों की बौछार,
कौन बचता? सब लाचार!
गुलाल उड़ता, हँसी बरसती,
हर गली में मस्ती ही मस्ती।

शाम को छतों पर जमती महफ़िल,
कवि सम्मेलन, पकवानों की हलचल।
सादगी में कितना अपनापन,
हर दिल में बसता था स्पंदन।

और आज… वही होली है, वही रंग,
बस जुड़ गए हैं नए-नए ढंग।
संदेश सुबह-सुबह पहुँच जाता,
“हैप्पी होली” हर दिल तक जाता।

वीडियो कॉल पर मुस्कानें खिलतीं,
दूर रहकर भी दूरियाँ न दिखतीं।
तस्वीरें पल में पार समंदर,
दिलों को जोड़ें एक ही अंदर।

मेलबर्न से अपने गाँव की राह,
अब बस एक क्लिक की चाह।
पचास से ज़्यादा सार्वजनिक आयोजन,
और कितने ही निजी मिलन-समारोह सजें।

पहले जो थी बस मोहल्ले की बात,
आज वही रंगों की वैश्विक सौगात।
पर हर पोस्ट, हर संदेश में आज भी,
बसता है वही बचपन कहीं।

हम अब भी गले मिलते हैं,
अब भी दिल से दिल सिलते हैं।
बस दायरा हुआ है बड़ा,
रंगों ने दुनिया को जोड़ा।

आओ मनाएँ फिर से ऐसे,
यादें सँजोएँ दिल के पास वैसे।
तब की होली… आज की होली…
बदले साधन, पर भावना भोली।

चलो रंग भरें जीवन में फिर,
पास हों सब — चाहे दूर हों कितने ही घर
*****

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