मार्च 2026

पर्यटन विहार
वसुन्धरा इन्कलेव, दिल्ली
छोटा सा पौधा नीम अब बड़ा हो गया था।
हरा भरा हो गया था।।
पत्ते हर्ष से हिलने लगे थे।
डाली डाल से मिलने लगे थे।।
हरा भरा सुन्दर पेड़।
पूछा आने में हुआ क्यों देर।।
देता क्या उसे जबाब
स्वयं बन गया मैं सवाल।।
उसे बोला यार
तूं निकला वफादार
मैं तो साथ निभा न सका
परदेश से आ न सका।।
तू निभाया आजीवन साथ
निभा रहा मरने के बाद।।
मृगतृष्णा में भूल गए अपने को
सजाते रहे सपने को।।
ऐसो आराम जुटाने में
निकल गये हम दूर
बढा मेरा गुरूर।।
परिजन से जब परे लात
मिला बेबफा का सौगात।।
हुआ तब हमें एहसास।।
था तोड़ा मैं ने भी विश्वास।।
मांगने आया था क्षमा
पर कोई नहीं यहां।।
हथेली पर होते ही गर्म तरल का एहसास।
सहसा मैं चौका।
भावों को किसने घोंटा।।
बोला नीम का पेड़
क्यों किया तुमने देर।।
आ जाते एक बार जब वे जिंदा थे
तुम्हें पता भी है
वे कितने शर्मिंदा थे।।
सुनते जैसे ही कोई विदेश से आया है
पूछने जाते क्या मेरे बेटे का संदेश लाया है।।
नींद से चौक कर उठते थे।
द्वार पर तुमको ही ढूंढते थे।।
थक्कर हो जाते थे निराश
नित जागते नया विश्वास।।
सुनते थे सबसे ताना
है नही बेटे को आना।।
तुम्हें तेरे यादों में चुनते थे
लिखे तेरे अक्षरों को चूमते थे।।
मैं उनके हर भाव के गवाह हूँ
समाये हुए उनकी आह हूँ।।
उनकी आंखें अंत समय तुम्हें ही ढूँढ रही थी।
तुम्हारा ही पता पूछ रही थी।।
किए होते कभी-कभी फोन पर ही बात।
पूछे होते जज्बात।।
काश! काश!!
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