मार्च 2026

पुणे, महाराष्ट्र
आज के
नए जमाने की
अब तो हद्द हो गई।
बीबी के आगे
अब माँ तो
रद्द हो गई।
कितने अरमानों से
मन्नतों से पाया।
आज बेचारी
बेअक्ल हो गई।
जिससे चार आँखे
जब से हो गई।
वही सच्ची
हमदर्द हो गई।
पड़ता नही सुनाई।
बहरी हो गई।
दिखता भी कम भाई।
कोई दिखता भी नही।
नही जाती
कहीं टर के
बेकार जो हो गई।
उठा रही जो मुसीबत।
देखो मुसीबत
हो गई।
बीबी के आगे
जुबान बंद हो गई।
माया की मुहब्बत
अब रद्द हो गई।
कब तक
खाएगी जान
पति के टुकड़ों
पर पल रही।
लेकर कितनी उम्र
जियेगी।
अब तो हद्द
हो गई।
तिनके तिनके
से बनाये घर में
बेघर हो गई।
एक दिन
अचानक वो वृद्धाश्रम की
हो गई
*****
