दिसंबर, 2025

चेन्नई
जरा और यौवन के
संधिपत्र पर
वक्त करता है जब
हस्ताक्षर…
तो होता है घटित
कभी संकुचन, कभी प्रस्फुटन,
कभी निश्चिंतता, कभी असमंजन।
तिराहे पर खड़ी ज़िंदगी
बात करना चाहती है
ठहरे हुए लम्हों से
पर आज…
कहाँ देता है मोहलत
एकाकी भविष्य खींचता अपनी ओर
इसी कल-आज की ऊहापोह में
मन का थकता पोर-पोर।
न अगन बची, न स्वप्न बचे
मानो छूटे जाते दोनों छोर।
टूटती शाखें और झरते फूल
भिगो जाते आँखों के कोर।
मन रहता चिंतित कभी-कभी
क्या देख पाऊँगा कल की भोर?
इसी आस-निरास के झूले पर
दिल हर दिन पींगे भरता है,
सुबह रश्मियों के झुरमुट में
हर दिन बोनस सा लगता है।
जो दे जाती संदेश यही कि
हर पल का आनंद उठाओ,
परहित में स्वयं को करो समर्पित,
मर कर भी तुम जी जाओ।
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