ईमेल के दादाजी
सितंबर, 2022 किसी ने मुझसे पूछ लिया- “ईमेल के दादाजी कौन है?” मैंने कहा- “अरे इसका भी कोई डी.एन.ए. होता
सितंबर, 2022 किसी ने मुझसे पूछ लिया- “ईमेल के दादाजी कौन है?” मैंने कहा- “अरे इसका भी कोई डी.एन.ए. होता
दिलीप कुमार सितंबर, 2022 अचानक फेसबुक पर मुझे टैग की गयी पोस्ट्स पर मेरी नजर पड़ी तो हैरान रह गया।
सितंबर, 2022 किसी गाँव में एक धनी व्यापारी रहता था। वह भगवान का भक्त था। एक बार कहीं जाते समय
सितंबर, 2022 गाँव में एक पुराने बरगद की अधिकांश शाखाएँ सूख चुकी थीं। शाखाओं के कोटरों में पक्षी निवास करते
समीर उपाध्याय ‘ललित’ चोटीला, जिला: सुरेंद्रनगर गुजरात सितंबर, 2022 श्रवण- “बड़े भैया, माँ की तबीयत बहुत ख़राब है। बेहोश-सी हो
सितंबर, 2022 देखो रामसिंह! यह पेड़ सूख रहा है इसमें पानी डालो। यहाँ पानी नहीं आ रहा तो मेरे घर
मेरी बात मानिए बच्चन बाबू, लड़का होनहार है, यहाँ गाँव में रह कर ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगा। अभी तक
मोबाइल स्क्रीन पर तेजी से हरकत करती बब्लू की अंगुलियाँ ठिठक-सी गई। उसने दादा जी को देखा और मुस्करा कर
सुबह के १० बजे थे। रोज़ाना की दिनचर्या से निबट जलपान ख़त्म कर शारदा जी ने नौकर को आवाज़ दी।
“नर्स बेटा! कुलबीरा आया?” ”नहीं, माँजी!” चौथी बार पूछने पर नर्स ने धैर्यपूर्वक, बीबी हरदेई कौर को उत्तर दिया। “माँजी!
“मम्मी, मम्मी जल्दी करो ‘जूम वाली दादी’ आने वाली है कहानियाँ सुनाने” खुशी से चहकते हुए चिंटू बोला। प्रतिदिन शाम
एक बार एक आदमी ने एक हाथी को रस्सी से बँधे हुए देखा। वह रस्सी इतनी मज़बूत नहीं थी कि
वे न मेरे डैडी हैं, न पापा। शुद्ध पिताजी हैं। कहीं ‘काका’ तो कहीं ‘बापू’। ठेठ गँवई। न जमाने का
न जाने क्यों, अरुंधति आज उस बुझे हुए लकड़ी के चूल्हे की राख को उलट-पुलट कर देख रही थी और
यह घटना उस समय की है, जब मैं राँची के वीमेंस कॉलेज में बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। समय अस्सी
1980 का वर्ष था। सूर्य ग्रहण लगा था। केवल एक ही चैनल वाले टीवी ‘दूरदर्शन’ पर गुड्डी फिल्म दिखा रहे
एक ऐसे दौर में जब झूठ को खूब बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापित किया जाए तो वो करीब-करीब सच होने जैसा लगने लगता
नन्ही को गोद में उठाकर क्या सोचने लगते हो, बिटवा?’ दादाजी ने रोहित से पूछा। ‘दादाजी, सोचता हूँ कि साझे
प्रकाश जब आज दफ्तर से लौटा तो उसके साथ उसके स्वर्गवासी पिता के दोस्त डॉक्टर दिनेश चन्द्र भी साथ में
सत्तर वर्षीय शन्नो देवी चुपचाप अपने कमरे में लेटी लगातार छत पर लगे पंखे को घूर रही है। उसके अंदर,
राधा प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका थी, अपने काम से मतलब रखने वाली, किसी से भी बहुत ज्यादा बातें नहीं करती
राजधानी में बरस भर से ज्यादा चला खेती-किसानी के नाम वाला आंदोलन खत्म हुआ तो तंबू-कनात उखड़ने लगे। सड़क खुल