हम सेल्फमेड नहीं, अन्य सभी के सहयोग से हमारा अस्तित्व है
दिसंबर, 2025 उत्तुंग पर्वत-शृंखलाओं की बर्फीली चाटियों के स्पर्श से स्नात सुबह की शीतल हवा सबसे बेख़बर अपनी ही मस्ती
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दिसंबर, 2025 उत्तुंग पर्वत-शृंखलाओं की बर्फीली चाटियों के स्पर्श से स्नात सुबह की शीतल हवा सबसे बेख़बर अपनी ही मस्ती
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दिसंबर, 2025 प्रस्तावना आज आज के इस अति गतिशील युग में जहाँ लोग भागमभाग में लगे हुए है, सुबह उठते
दिसंबर, 2025 आज विश्वभर में वृद्ध अवस्था में अकेलापन सामाजिक, मानसिक, आर्थिक तथा नैतिक दृष्टि से एक सर्वव्याप्त समस्या बन
दिसंबर, 2025 जब जीवन का सूरज अपनी ढलान की ओर बढ़ता है, तब उसकी किरणें उतनी तीखी नहीं रहतीं, पर
दिसंबर, 2025 (परिचय: एन. मण्डल मिथिला-बिहार के फिल्मकार, लेखक और संपादक हैं। उनकी रचनाओं में मिट्टी की सुगंध, मानवीय संवेदनाएँ
दिसंबर, 2025 वृद्धावस्था जीवन की वह सांध्य बेला है जहाँ प्रकाश और अंधकार दोनों साथ चलते हैं। शरीर धीमा पड़ने
स्मृतियों से मौन संवाद करती वृद्धावस्था और एकाकीपन Read Post »
दिसंबर, 2025 प्रस्तावना जीवन चक्र में प्रत्येक अवस्था का अपना महत्त्व और अनुभव होता है। बाल्य, युवावस्था और प्रौढ़ावस्था—प्रत्येक काल
बबीता झा दिसंबर, 2025 भगवान बुद्ध जब अपने शिष्यों को धर्म-प्रचार हेतु विभिन्न दिशाओं में भेज रहे थे, तब जाने
मेरे साँवरिया कान्हा… आज जन्म लो मेरे मन के सूने आँगन में, जहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा अब प्रार्थना बन चुकी है।
शिक्षक दिवस पर नमन जिसने अंधकार में दीप जलाया, जिसने जीवन की राह दिखाई, गिरकर फिर उठना सिखाया— आज उन
मैं अपनी नायिका हूँ पथ में काँटे मिलें अगर, तो पग रुकने न दूँगी। अँधियारे के आँचल में भी, अपनी
हम 60+ हैं — सुन रहे हैं? 60+ हैं साहब— ओल्ड नहीं, गोल्ड हैं! बस चश्मा बड़ा हो गया है,
और अंत में बस इतना याद रखना— उम्र चाहे कितनी भी हो, सपनों को उम्र मत देना। राहें चाहे कितनी
बबीता झा सितंबर, 2025 “संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।” इतनी निस्संकोच
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त: युग-प्रवर्तक और खड़ी बोली के शिल्पी Read Post »
बबीता झा सितंबर, 2025 4 मार्च 1932 को दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग नगर में चिकित्सीय जटिलताओं के बीच एक नन्हीं
मिरियम मकेबा: जिसने संगीत को क्रांति का हथियार बना दिया (प्रेरक व्यक्तित्व) Read Post »
सितंबर, 2025 कल सवेरे मैं अपने घर में चाय पी रहा था तो किसी ने मेरे घर का दरवाजा बजाया
सितंबर, 2025 साहित्यकारों की एक जमात थाने को घेरे हुए थी। एक थाने से थानेदार दूसरे थाने को फोन करके
सितंबर, 2025 शहर के एक बड़े बैंक में सुबह से ही भीड़ थी। ग्राहक कतार में खड़े अपने-अपने काम निपटाने
सितंबर, 2025 विनी और बिट्टू दोनों भाई-बहन मैले-कुचैले कपड़े पहने थे। हाथों में छोटी-छोटी बोरियाँ थीं। वे कचरे बीनने जा
सितंबर, 2025 आज अंजू कुछ अलग ही लग रही थी। चुपचाप नज़रें झुकाए कम कर रही थी। “क्या हुआ अंजू?
सितंबर, 2025 “अरे माँ सुबह शाम टहलने जाया करो ना। घर से बाहर निकलोगी तो किसी से दोस्ती भी हो
सितंबर, 2025 ‘देवासुर संग्राम में अवध नरेश महाराज दशरथ की सहायता करने के एवज में महारानी कैकेई ने उनसे दो
बबीता झा सितंबर, 2025 एक राजा ने किसी बात से क्रुद्ध होकर अपने एक बुद्धिमान मंत्री को मृत्युदंड की सजा
सितंबर, 2025 यादों को गंगाजल कह कर पीते जिसके नाम को; रोज सुबह मिल करके उससे, लौटा देते शाम को।
सितंबर, 2025 दिन दहाड़े हो गया, विश्वास का ही अपहरण स्वार्थवादी नाग बैठे, डस रहा अब नारी तन देखो पूर्णिमा
सितंबर, 2025 ख़ून की बूँदों से भीगी ज़मीं, जहाँ कभी बचपन दौड़ा था कहीं। अब खामोशी काँप रही थी, दीवारें
सितंबर, 2025 पिता है तो नींद है, सपने हैं पिता है तो सुविधा है नास्तिक होने की पिता के होते
सितंबर, 2025 बचपन में शैतान रहा हूँ, उतना ही नादान रहा हूँ। हर कोई मुझे पढ़ना चाहे, ऐसा मैं दीवान
सितंबर, 2025 आओ आजादी का जश्न मनाएं हर घर तिरंगा लहराएं अमर शहीदों की गाथा हर बालक को सुनाएं तोड़
सितंबर, 2025 खबर मेरी शहादत की, मेरे घर जब गई होगी! लिपट कर देह जब मेरी, तिरंगे में गई होगी!
शहीद की शहादत शहीद की जुबानी (शहीदों को समर्पित) Read Post »
सितंबर, 2025 पत्थरों का सीना चीर बहती नदिया कल कल कल फौलादी जब तेरे हौसले दूर कहां तेरी मंजिल उठ
कर्त्तव्य पथ पर तू चलता चल (वीर सैनिकों को समर्पित) Read Post »
सितंबर, 2025 वरिष्ठ हूँ मैं बचपन से बुढ़ापा सोलह संस्कार की गाथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और तथाता सबका ध्याता
सितंबर, 2025 जोड़ रही जो एक तार से, सारे भारतवासी इतने सारे बच्चे जिसके, वो क्यों रहे उदासी कहे कोई
सितंबर, 2025 ढूँढता आकाश जिसको बादलों ने घेर ली है, दूर चारों ओर चादर, क्षितिज ने जो ओढ़ ली है;
सितंबर, 2025 जहां उन्नति की आवश्यकता थी वहां के विकास के बारे में हमने एक बार भी नहीं सोचा, जब
सितंबर, 2025 मान है अभिमान हिंदी बन गई पहचान हिंदी विश्व को अब भान है कि भारत माँ के प्राण
सितंबर, 2025 उत्तर से दक्षिण तक धारा। हिंदी से फैला उजियारा।। घर आंगन की प्यारी बोली। लगे सुहानी जैसे होली।।
सितंबर, 2025 अपनी भाषा अपनों की भाषा सपनों की भाषा अपने सपनों की भाषा माँ की भाषा ममता की भाषा
सितंबर, 2025 हिंदी है एक मजबूत और विकसित होती हुई भाषा, आने वाले समय में हिंदी होगी नंबर वन ये