टूटता धैर्य, बढ़ती हिंसा
जून, 2025 हिंसा केवल शारीरिक आक्रमण नहीं है, बल्कि वह हर विचार, शब्द और कर्म है जिससे किसी जीव की
जून, 2025 हिंसा केवल शारीरिक आक्रमण नहीं है, बल्कि वह हर विचार, शब्द और कर्म है जिससे किसी जीव की
जून, 2025 (श्री संदीप श्रीवास्तव जी को सादर श्रद्धांजलि स्वरूप) जिस पल में हम जीने लगे। जो पल सत्य बन
जून, 2025 “अहिंसा परमो धर्मः” — महाभारत का यह सूत्र केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं, अपितु मानवता की नींव है।
जून, 2025 मित्रों! भारत जैसे अहिंसा प्रिय देश में निरंतर बढ़ती हत्या एवं हिंसा की हृदय विदारक घटनाएं दिल को
बबीता झा जून, 2025 महाभारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है—आचार्य द्रोण एवं पांचाल देश के राजा द्रुपद के संबंधों
मित्रता, अहंकार और प्रतिशोध: आचार्य द्रोण एवं राजा द्रुपद की कथा Read Post »
बबीता झा जून, 2025 एक निर्धन व्यक्ति से एक मुस्लिम व्यक्ति कहता है कि उसे ‘वेटरनरी डॉक्टर’ को देने के
हे गणनायक, सूंड से अज्ञान की गाँठ खोलो,एकदंत से सत्य का बोध कराओ,बड़े कानों से मेरे मौन को सुनो,और इस
हिंदी केवल भाषा नहीं, मन की वह मौन ध्वनि है जो शब्द बनकर हमारी आत्मा को छू जाती है। इसमें
बबीता झा मार्च, 2025 दुनिया के सबसे अधिक प्रतिभाशाली गणितज्ञों में गिने जाने वाले श्रीनिवास रामानुजन को ‘द मैन हू
श्रीनिवास रामानुजन: एक महान गणितज्ञ (प्रेरक व्यक्तित्व) Read Post »
बबीता झा मार्च, 2025 सदियों पुरानी बात है। एक बालक विद्या अध्ययन के लिए गुरुकुल गया। किंतु उसकी स्मरण शक्ति
मार्च, 2025 श्रीरामचरितमानस गान प्रतियोगिता आयोजित थी। माँ वैदेही मानस मंडली अपनी प्रस्तुति दे रही थी। किष्किन्धाकाण्ड का कथा प्रसंग
मार्च, 2025 काफी दिनों बाद आज घर में छुट्टी बिताने का अवसर मिला, सोचा कहीं बाहर न जाकर घर में
मार्च, 2025 सच्चे होने की बात दावा तो कर रहे हो कि सच बोलूंगा, लिखूंगा, इंसान हूँ इंसान दिखूंगा, मगर
मार्च, 2025 मधुर स्मृतियों को स्मृति चिन्ह बनाती प्यारी हिंदी। हिंद की बिंदी हिंदी। तिरंगे से सजी जय हिंद के
मार्च, 2025 गीत मैं किसको सुनाऊँ, सामने कोई नहीं हो सहचरी सोई कहीं हो तरु भरे वीरान जंगल में खड़ा
मार्च, 2025 रंग प्रीत की सज गई आज। है खुशियों की होली।। उड़े मेघ में तितली जैसी, सुरम्य दिखे नजारे।
मार्च, 2025 तिरंगा है हमारी शान भारत मां की आन-बान करते हैं हम इसे सलाम न्योछावर कर देगें अपने प्राण
मार्च, 2025 मां! दिला दो एक पिचकारी देखो सब खेल रहे हैं। मार मार कर किलकारी मां! दिला दो एक
मार्च, 2025 जाल में मछली फंसी आँखें सजल हुई मछुआरे तेरी पहल पे मेरी ग़ज़ल हुई छूटती हुई सांसों का
बबीता झा मार्च, 2025 नदी किनारे मैं खड़ी सो पानी झिलमिल होय, पी गोरी मैं साँवरी अब किस विध मिलना
मार्च, 2025 प्रायः देखा जाता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत होने वाले कार्यक्रमों में मृतक की प्रशंसा
आइए तैयारी करें स्वयं अपनी रस्म पगड़ी की (जीने की कला) Read Post »
मार्च, 2025 ‘है ठान लिया हमने सूरज सा जलना है। सपनों को दो परवाज़ अगर उड़ने की तमन्ना है।’ जब
मार्च, 2025 पढ़ने की आवश्यकता पहले थी, अभी है और आगे भी सदा रहेगी – चाहे डिजिटल युग हो या
मार्च, 2025 पढ़ने के शौकीन लोग कोई समय व्यर्थ नहीं गवाते। जगह, यात्रा, छुट्टियां सब को मनोरंजक और रोमांचक बनाते
बबीता झा मार्च, 2025 ‘पढ़ना’ बौद्धिक क्षमता बढ़ाने का एक सशक्त साधन है। डिजिटल या भौतिक (Physical) माध्यमों की तुलना
पढ़ाई’ क्या है और यह मस्तिष्क को कैसे प्रभावित करती है? Read Post »
मार्च, 2025 मित्रों! 8 मार्च को प्रतिवर्ष धूमधाम से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। महिलाओं की उपलब्धियों एवं सशक्तिकरण
बबीता झा मार्च, 2025 प्राचीन समय की बात है। एक गाँव में चार मित्र रहते थे। वे चारों उच्च शिक्षा
पुस्तकीय ज्ञान, सहज विवेक और डिजिटल युग की चुनौतियाँ Read Post »
दिसंबर, 2024 “ख्वाबों, बागों और नवाबों के शहर लखनऊ में आपका स्वागत है” यही वो इश्तहार है जो उन लोगों
दिसंबर, 2024 (संक्षिप्त परिचय- छह पुस्तकें, तीन काव्य संग्रह एवं तीन लघुकथा संग्रह प्रकाशित। देश-विदेश की अनेक सुप्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में
दिसंबर, 2024 माँ मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। वाह! मैदान भी हरा–भरा है। चीनू उछलते हुए अपनी माँ से
दिसंबर, 2024 “इतने दिनों से मैं तुम्हें समझा रही थी; बात समझ नहीं आ रही थी? मेरे तन को खोखला
दिसंबर, 2024 आप के शहर से…… न्यूज चैनल….अगर …..आप में से कोई इस व्यक्ति को पहचानता है। तो कृपया हमें
दिसंबर, 2024 सुबह निकल गया हूँ दिन-भर भटक रहा हूँ शाम को घर लौट रहा हूँ नए अनुभवों के साथ
दिसंबर, 2024 दिन भर की भगदौड़ और रात की नींद के बाद जैसे ही मुझे मिला मौका, तीन दिनों के
दिसंबर, 2024 खींझती झल्लाती अपनों पर झूंझलाती हुई निकली मैं सेंकने धूप हरित वाटिका हरित आसनांदिका हरित अशोक स्वरणित आलोक
दिसंबर, 2024 साठ की दहलीज़ पर जब कदम बढ़ाए, जीवन के अनुभव संग नयन मुस्काए। बालों में चाँदी, पर मन
दिसंबर, 2024 अंतिम श्वांसों तक है झरना, चलना चाहता मैं अविराम। घटित हुआ जाने है क्या-क्या, धुले याद में शहर
दिसंबर, 2024 मरू स्थल सूखी घास सूखे पेड़ सूखी फसल कटी फसल फिर फसल के सूखे ठूंठ सुखी मिट्टी के