जैसा आप चाहें
एक ऐसे दौर में जब झूठ को खूब बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापित किया जाए तो वो करीब-करीब सच होने जैसा लगने लगता
एक ऐसे दौर में जब झूठ को खूब बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापित किया जाए तो वो करीब-करीब सच होने जैसा लगने लगता
1980 का वर्ष था। सूर्य ग्रहण लगा था। केवल एक ही चैनल वाले टीवी ‘दूरदर्शन’ पर गुड्डी फिल्म दिखा रहे
यह घटना उस समय की है, जब मैं राँची के वीमेंस कॉलेज में बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। समय अस्सी
न जाने क्यों, अरुंधति आज उस बुझे हुए लकड़ी के चूल्हे की राख को उलट-पुलट कर देख रही थी और
वे न मेरे डैडी हैं, न पापा। शुद्ध पिताजी हैं। कहीं ‘काका’ तो कहीं ‘बापू’। ठेठ गँवई। न जमाने का
एक बार एक आदमी ने एक हाथी को रस्सी से बँधे हुए देखा। वह रस्सी इतनी मज़बूत नहीं थी कि
नन्ही को गोद में उठाकर क्या सोचने लगते हो, बिटवा?’ दादाजी ने रोहित से पूछा। ‘दादाजी, सोचता हूँ कि साझे
बारिश का मौसम यूँ तो तपती धरती को सराबोर करने वाली रिमझिम फुहार का मौसम होता है, झुलसे पेड़-पौधों पर
बरसात में सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है ये सावधानियाँ Read Post »
आजकल एक सामान्य समस्या है—‘समय न होना’। कामकाजी महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। कुछ लोग अधिक आर्थिक लाभ
जब हम हम घर बनाते हैं, इसकी खूबसूरती और कई बार वास्तु का भी ख़्याल रखते हैं, पर अपने बुजुर्ग
छः चीजें घर में जरूर बनवाएँ, अगर घर में बुजुर्ग है Read Post »
वृद्धावस्था के संबंध में हमारे महाकाव्यों में एक बहुत ही रोचक कहानी है। यह कहानी है ययाति की। ययाति को
प्यार हो पर्दा तले तो ठीक है साथ जीवन भर चले तो ठीक है। है जरूरत आदमी को सैकड़ों प्यार
ये दंतुरित नादान बरबस खींचते हैं हमारा ध्यान। इनकी किलकारियां, मनमानियां पर रीझता है सारा जहांन।। दोनों नाजुक होठों के
किन शब्दों से आज तेरा ऋंगार करूँ माँ! हर शब्द तुच्छ लगते हैं इन शब्दों से है तू परे माँ!
नेतागण चिंतित बहुत, कैसे सुधरे देश। जनता-चिंता में वे खुद, बदल रहे परिवेश।। बदल रहे परिवेश, बहुत चिंतित रहते हैं।
छोड़ दो मुझको अकेला जो भी होगा झेल लूँगा। जो भी चट्टानें मिलेंगी मैं अकेले ठेल लूँगा।। आज मेरे साथ
राम- नाजायज़ यूँ तो ज़िन्दगी जीने के कई बहाने है, कुछ हकीकत है तो कुछ फसाने है। रोज नए जख़्मों
मातबर क़लम किसी आईना से कम नहीं होता। बेलाग चेहरा सत्ता का हमदम नहीं होता॥ शान से रखते हैं लोग
राजधानी में बरस भर से ज्यादा चला खेती-किसानी के नाम वाला आंदोलन खत्म हुआ तो तंबू-कनात उखड़ने लगे। सड़क खुल
राधा प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका थी, अपने काम से मतलब रखने वाली, किसी से भी बहुत ज्यादा बातें नहीं करती
सत्तर वर्षीय शन्नो देवी चुपचाप अपने कमरे में लेटी लगातार छत पर लगे पंखे को घूर रही है। उसके अंदर,
प्रकाश जब आज दफ्तर से लौटा तो उसके साथ उसके स्वर्गवासी पिता के दोस्त डॉक्टर दिनेश चन्द्र भी साथ में
नदियों की संस्कृति अच्छी है। वह बहती है दो किनारों को साथ लेकर वो हमारे लिए तैयार करती जाती है
नारी से संसार है, नारी में संसार। नारी ही संसार है, नारी ही है प्यार।। सृष्टि में नारी तत्व महान्।
माँ प्यारी माँ! तुम मेरी प्रथम पाठशाला हो तुम्हीं मेरी आदर्श हो तुम्हीं मेरी गुरू हो सब कुछ तो मैने
माँ अब फुर्सत में है दूध की बोतल और पालने के बीच भागने वाली माँ अब फुर्सत में है स्कूल
प्रिय वसंत, पिछली बार जब तुम लौटे थे या तो भूल गए थे या फिर जान कर तुम सुलगते हुए
चँदा मामा से बच्चों का नाता सदा। सारे बच्चों को चँदा लुभाता सदा। चाँद को बाल्टी में पकड़ता है वो।
मानव और प्रकृति के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। मानव प्रकृति का एक अभिन्न अंग है। प्रकृति के बगैर मानव
“होली” शब्द में ही होली की विशेषता समाहित है। होली शब्द में चार वर्णों का योग है- ह+उ+ल+ई। ह=हर्ष, उ=उल्लास,