कानूनी समस्याएँ
प्रश्न– मेरे बेटे की सात महीने पहले शादी हुई है। लेकिन बहू का व्यवहार ठीक नहीं है। दो महीने बाद
प्रश्न– मेरे बेटे की सात महीने पहले शादी हुई है। लेकिन बहू का व्यवहार ठीक नहीं है। दो महीने बाद
वृद्धावस्था उम्र का वह अहम पड़ाव है जब हमें अपने शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक और आर्थिक स्वास्थ्य की भी
वृ़द्धावस्थाः तन, मन और धन तीनों का रखरखाव है जरूरी Read Post »
नौकरी एक निश्चित आय और कार्य देकर आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है। बहुत-सी नौकरियों में सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन का
10 कार्य, जिनसे सेवानिवृति के बाद भी उपार्जन किया जा सकता है Read Post »
मैं सेवानिवृत्त कर्मचारी, पहले दरबार लगाता था। अब बना हुआ हूँ दरबारी। मैं सेवानिवत कर्मचारी।। पहले कार्यालय जाता था, अपनी
गुप्ता जी और मिश्रा जी, राज्य सरकार के एक ही विभाग में क्लर्क के रूप में 35 वर्ष की सेवा
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार यूरोपीय देशों में आर्थिक मंदी के दौर में परिवार के
मानवीय शरीर की क्षीण काया भी परिवार की मजबूत नींव के रूप में स्थान रखती है। जिस प्रकार एक पुरानी
वामिका शर्मा एक मुस्कान एक हजार आँसू छिपा सकती हैं— यह तो कहावत है। मगर यही छिपे हुए आँसू कहीं
जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं, तो “सक्रिय जीवन” की बात जरूर करते हैं। लेकिन यह सक्रियता क्या है?
भोजन हम जीवन पर्यंत लेते हैं। लेकिन फिर भी क्या खाएँ और कैसे खाएँ, इस संबंध में कुछ जानबूझकर की
भोजन और भजन की ये 5 सावधानियाँ रखेंगी आपको सेहतमंद Read Post »
2018 की विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर वर्तमान में मनुष्य जाति की औसत
दीर्घ जीवन के 9 मंत्र देते हैं विश्व के ये पाँच ब्लू जोन Read Post »
2019 में सुदामा देवी के साथ एक पत्रकार का साक्षात्कार समाचार पत्र में पढ़ी तो मैं भाव विह्वल हो गई
“मम्मी, मम्मी जल्दी करो ‘जूम वाली दादी’ आने वाली है कहानियाँ सुनाने” खुशी से चहकते हुए चिंटू बोला। प्रतिदिन शाम
“नर्स बेटा! कुलबीरा आया?” ”नहीं, माँजी!” चौथी बार पूछने पर नर्स ने धैर्यपूर्वक, बीबी हरदेई कौर को उत्तर दिया। “माँजी!
भूमिका ‘बुझी राख मत हमें समझना हम अंगारों के गोले हैं। देश आन पर मिटने वाले हम बारूदी शोले हैं।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में दक्षिण भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान Read Post »
प्रथम नमन गुरु आपको, दिया आपने ज्ञान कैसे मिल पाते हमें, परम दिव्य भगवान।” गुरु हमारे जीवन में दीपक की
एक ऐसे दौर में जब झूठ को खूब बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापित किया जाए तो वो करीब-करीब सच होने जैसा लगने लगता
1980 का वर्ष था। सूर्य ग्रहण लगा था। केवल एक ही चैनल वाले टीवी ‘दूरदर्शन’ पर गुड्डी फिल्म दिखा रहे
यह घटना उस समय की है, जब मैं राँची के वीमेंस कॉलेज में बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। समय अस्सी
न जाने क्यों, अरुंधति आज उस बुझे हुए लकड़ी के चूल्हे की राख को उलट-पुलट कर देख रही थी और
वे न मेरे डैडी हैं, न पापा। शुद्ध पिताजी हैं। कहीं ‘काका’ तो कहीं ‘बापू’। ठेठ गँवई। न जमाने का
एक बार एक आदमी ने एक हाथी को रस्सी से बँधे हुए देखा। वह रस्सी इतनी मज़बूत नहीं थी कि
नन्ही को गोद में उठाकर क्या सोचने लगते हो, बिटवा?’ दादाजी ने रोहित से पूछा। ‘दादाजी, सोचता हूँ कि साझे
बारिश का मौसम यूँ तो तपती धरती को सराबोर करने वाली रिमझिम फुहार का मौसम होता है, झुलसे पेड़-पौधों पर
बरसात में सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है ये सावधानियाँ Read Post »
आजकल एक सामान्य समस्या है—‘समय न होना’। कामकाजी महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। कुछ लोग अधिक आर्थिक लाभ
जब हम हम घर बनाते हैं, इसकी खूबसूरती और कई बार वास्तु का भी ख़्याल रखते हैं, पर अपने बुजुर्ग
छः चीजें घर में जरूर बनवाएँ, अगर घर में बुजुर्ग है Read Post »
वृद्धावस्था के संबंध में हमारे महाकाव्यों में एक बहुत ही रोचक कहानी है। यह कहानी है ययाति की। ययाति को
प्यार हो पर्दा तले तो ठीक है साथ जीवन भर चले तो ठीक है। है जरूरत आदमी को सैकड़ों प्यार
ये दंतुरित नादान बरबस खींचते हैं हमारा ध्यान। इनकी किलकारियां, मनमानियां पर रीझता है सारा जहांन।। दोनों नाजुक होठों के
किन शब्दों से आज तेरा ऋंगार करूँ माँ! हर शब्द तुच्छ लगते हैं इन शब्दों से है तू परे माँ!
नेतागण चिंतित बहुत, कैसे सुधरे देश। जनता-चिंता में वे खुद, बदल रहे परिवेश।। बदल रहे परिवेश, बहुत चिंतित रहते हैं।